Wednesday, 4 February, 2009

ख्वाब

ख्वाब पहले भी
अब भी; आगे भी
सिफॅ टूटते
बनते नहीं हैं, ख्वाब
फिर भी आदमी
देखता है ख्वाब

1 comment:

आशीष said...

सही कहा.....ख्वाब सिर्फ टूटते हैं बनते नहीं...फिर भी हम ख्वाब देखना नहीं भूलते हैं। ख्वाब ही तो हैं जो हमें कुछ करने के लिए प्रेरणा देते हैं