Friday 18 December 2009

अपन राम की कहानी




6 comments:

UP LIVE said...

bahut achha likha aapne
kya aap hamare web portel ke liye likhna chahege
pls visit www.uplivenews.in
email--uplive2009@yahoo.in

vibhor said...

बहुत खूब सर जी, प्रभात खबर आपका पहला प्यार और बेशक अपना पहला प्यार कोई नहीं भूलता, सिर्फ चार पन्नों में पूरी यात्रा समेटने कि कोशिश की है मुझे बहुत अच्छा लगा और बिस्तार से लिखिए सर दो बार पढ़ चुका हूँ, मन नहीं भरा पूरा पढना चाहता हूँ ......
बेशक सर एक छोटे से शहर झुमरीतिलैया से नागपुर जैसे महानगर और फिर भोपाल से ग्वालियर तक कि आपकी यात्रा, कल रत जो मनोबल टूटा था आज आपको पढ़ कर फिर से एक नया संबल मिला है....
मेरी तो अभी शुरुआत है आपने तो इस पत्रकारिता के ढेरों रंग देखे हैं, बहुत अच्छे और बहुत बड़े लोगों का साथ आपको मिला, मेरे कण में आज फिर आपके वो शब्द गूँज रहे हैं कि-'मां के पेट से कोई सीख कर नहीं आता', मुझे अपने छह-सैट महीने के छोटे से कैरिअर में बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं बरना हर किसी के मुंह से सिर्फ एक ही बात निकलती है कि पत्रकारिता में आने की सलाह तुम्हे किसने दी थी? वक़्त है अभी भी लौट जाओ और फिर उनके सामने बड़ी ही बुलंद आवाज में वही पंक्तियाँ (jo आपने मेरी क्लास में सुनाई थीं) 'हमें मालूम है जन्नत की हकीक़त', दौरा देता हूँ और फिर धीरे से कहता हूँ 'दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल काफी है',....
लेकिन जब पत्रकारिता में आया हु तो पीछे नहीं हटूंगा चाहे कोई कुछ भी कहे सिर्फ और सिर्फ आगे बढ़ना है....
आप इसीतरह लिखते रहिये सर मुझे प्रेरणा मिलती रहेगी....

vibhor said...

बहुत खूब सर जी, प्रभात खबर आपका पहला प्यार और बेशक अपना पहला प्यार कोई नहीं भूलता, सिर्फ चार पन्नों में पूरी यात्रा समेटने कि कोशिश की है मुझे बहुत अच्छा लगा और बिस्तार से लिखिए सर दो बार पढ़ चुका हूँ, मन नहीं भरा पूरा पढना चाहता हूँ ......
बेशक सर एक छोटे से शहर झुमरीतिलैया से नागपुर जैसे महानगर और फिर भोपाल से ग्वालियर तक कि आपकी यात्रा, कल रत जो मनोबल टूटा था आज आपको पढ़ कर फिर से एक नया संबल मिला है....
मेरी तो अभी शुरुआत है आपने तो इस पत्रकारिता के ढेरों रंग देखे हैं, बहुत अच्छे और बहुत बड़े लोगों का साथ आपको मिला, मेरे कण में आज फिर आपके वो शब्द गूँज रहे हैं कि-'मां के पेट से कोई सीख कर नहीं आता', मुझे अपने छह-सैट महीने के छोटे से कैरिअर में बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं बरना हर किसी के मुंह से सिर्फ एक ही बात निकलती है कि पत्रकारिता में आने की सलाह तुम्हे किसने दी थी? वक़्त है अभी भी लौट जाओ और फिर उनके सामने बड़ी ही बुलंद आवाज में वही पंक्तियाँ (jo आपने मेरी क्लास में सुनाई थीं) 'हमें मालूम है जन्नत की हकीक़त', दौरा देता हूँ और फिर धीरे से कहता हूँ 'दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल काफी है',....
लेकिन जब पत्रकारिता में आया हु तो पीछे नहीं हटूंगा चाहे कोई कुछ भी कहे सिर्फ और सिर्फ आगे बढ़ना है....
आप इसीतरह लिखते रहिये सर मुझे प्रेरणा मिलती रहेगी....

vibhor said...

बहुत खूब सर जी, प्रभात खबर आपका पहला प्यार और बेशक अपना पहला प्यार कोई नहीं भूलता, सिर्फ चार पन्नों में पूरी यात्रा समेटने कि कोशिश की है मुझे बहुत अच्छा लगा और बिस्तार से लिखिए सर दो बार पढ़ चुका हूँ, मन नहीं भरा पूरा पढना चाहता हूँ ......
बेशक सर एक छोटे से शहर झुमरीतिलैया से नागपुर जैसे महानगर और फिर भोपाल से ग्वालियर तक कि आपकी यात्रा, कल रत जो मनोबल टूटा था आज आपको पढ़ कर फिर से एक नया संबल मिला है....
मेरी तो अभी शुरुआत है आपने तो इस पत्रकारिता के ढेरों रंग देखे हैं, बहुत अच्छे और बहुत बड़े लोगों का साथ आपको मिला, मेरे कण में आज फिर आपके वो शब्द गूँज रहे हैं कि-'मां के पेट से कोई सीख कर नहीं आता', मुझे अपने छह-सैट महीने के छोटे से कैरिअर में बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं बरना हर किसी के मुंह से सिर्फ एक ही बात निकलती है कि पत्रकारिता में आने की सलाह तुम्हे किसने दी थी? वक़्त है अभी भी लौट जाओ और फिर उनके सामने बड़ी ही बुलंद आवाज में वही पंक्तियाँ (jo आपने मेरी क्लास में सुनाई थीं) 'हमें मालूम है जन्नत की हकीक़त', दौरा देता हूँ और फिर धीरे से कहता हूँ 'दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल काफी है',....
लेकिन जब पत्रकारिता में आया हु तो पीछे नहीं हटूंगा चाहे कोई कुछ भी कहे सिर्फ और सिर्फ आगे बढ़ना है....
आप इसीतरह लिखते रहिये सर मुझे प्रेरणा मिलती रहेगी....

vibhor said...

बहुत खूब सर जी, प्रभात खबर आपका पहला प्यार और बेशक अपना पहला प्यार कोई नहीं भूलता, सिर्फ चार पन्नों में पूरी यात्रा समेटने कि कोशिश की है मुझे बहुत अच्छा लगा और बिस्तार से लिखिए सर दो बार पढ़ चुका हूँ, मन नहीं भरा पूरा पढना चाहता हूँ ......
बेशक सर एक छोटे से शहर झुमरीतिलैया से नागपुर जैसे महानगर और फिर भोपाल से ग्वालियर तक कि आपकी यात्रा, कल रत जो मनोबल टूटा था आज आपको पढ़ कर फिर से एक नया संबल मिला है....
मेरी तो अभी शुरुआत है आपने तो इस पत्रकारिता के ढेरों रंग देखे हैं, बहुत अच्छे और बहुत बड़े लोगों का साथ आपको मिला, मेरे कण में आज फिर आपके वो शब्द गूँज रहे हैं कि-'मां के पेट से कोई सीख कर नहीं आता', मुझे अपने छह-सैट महीने के छोटे से कैरिअर में बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं बरना हर किसी के मुंह से सिर्फ एक ही बात निकलती है कि पत्रकारिता में आने की सलाह तुम्हे किसने दी थी? वक़्त है अभी भी लौट जाओ और फिर उनके सामने बड़ी ही बुलंद आवाज में वही पंक्तियाँ (jo आपने मेरी क्लास में सुनाई थीं) 'हमें मालूम है जन्नत की हकीक़त', दौरा देता हूँ और फिर धीरे से कहता हूँ 'दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल काफी है',....
लेकिन जब पत्रकारिता में आया हु तो पीछे नहीं हटूंगा चाहे कोई कुछ भी कहे सिर्फ और सिर्फ आगे बढ़ना है....
आप इसीतरह लिखते रहिये सर मुझे प्रेरणा मिलती रहेगी....

jay said...

Namskar sir,

bade din ho gaye.... aap se mile...bat kare....esliya aapka blog padkar bahut achchha laga....shayad aap se milane par kabhi dhanishthta nahi dikhai, lekin etana jarur hai ki aapse milane par ek sakaratmak urja milati thi. shayad esliye hi aap se milana achchha lagata tha. mera liye aap sada gandi rajneeti ke beech bhi BHOLA MANUSH hi rahe. shayad media ke kisi mod par fir aapke sanidya me kam karane ka mouka milega.

vaise bata doo ki aapki bade khub yad raheti hai...fir chahe GALE-GALE PANEE, GALI-GALI PANEE wali hadline ho ya KHARID DAR OR KHARIDAR ka shabdik antar.

- JITENDRA CHOURASIYA
27jitendra@gmail.com