Monday 13 July 2009

ये जो है बाइपास

व्यस्त था. शहर से दूर. अनेक शहरों का भ्रमण. भीषण गरमी. लौटा तो रोजी.रोटी का चक्कर. लिखना नहीं हुआ. पढना हुआ. बहुत दिनों के बाद. एक उपन्यास. नाम कलि.कथाः वाया बाइपास. लेखिका
अलका सरावगी. अनूठी शिल्प शैली. सतही तौर पर कहें तो कोलकाता के एक मारवाडी युवक की कहानी. एक उपन्यास जिसके सहारे कोलकाता
के अतीत और वरतमान को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. साथ ही मारवाडियों के जीवन संधषॅ
और वहाँ औरतों के पाँवों में लगी बेडियों पर प्रकाश डालती कहानी. उपन्यास के नायक किशोर बाबू हैं.
जिनके माध्यम से सारी कहानी कही गई है. दरअसल यह उपन्यास आज कल की विडंबनाओं को उजागर
करता है. उस समाज की कहानी कहता है जो समस्यायों से बचकर सुविधाजनक रास्ता खोजता है. उपन्यास के तीन प्रमुख चेहरे हैं. सुभाष भक्त शांतनु\ गाँघीवादी अमोलक और किशोर बाबू. पूरा उपन्यास इन्हीं के आसपास धूमता है. तीनों का जीवन संधषॅ और बदलाव. एक उपन्यास जिसे देखना चाहिए. गंभीरता से.

4 comments:

Jandunia said...

उपन्यास के बारे में जो परत आपने खोली है..उससे थोड़ा बहुत उपन्यास के बारे में आइडिया होता है..अब तो इस उपन्यास को लेकर मन में ये विचार आ रहा है कि इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए..कम से कम कोलकाता की संस्कृति को जानने-समझने का मौका तो मिलेगा..

sarvesh said...

blog aur article dono hi bahut achcha hai...on screen hi sahi, bade dino baad aapko dekha...maja aa gaya muskurata chehra dekhkar...blo-jagat me swagat hai..likhte rahiye...post zara zaldi-zaldi hona chahiye.

http://sairgah.blogspot.com/
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sarvesh said...

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